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संसथान की संस्थापिका एवं जम्बुद्वीप रचना की सम्प्रेरिका
पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का
संक्षिप्त परिचय

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में "टिकैतनगर' नामक नगर के श्रेष्ठी श्री छोटेलाल जैन की धर्मपत्नी श्रीमती मोहिनी देवी की प्रथम संतान के रूप में 22 अक्टूबर सन 1934 आश्विन शुक्ल पूर्णिमा ( शरद पूर्णिमा ) की रात्री में 9 बजकर 15 मिनट पर "मैना" नामक एक कन्या का जन्म हुआ. पूर्व जन्म के संस्कार एवं इस भव के पुरुषार्थ के फलस्वरूप मैना ने सन 1952 में गृह त्याग कर सन 1953 में आचार्य श्री देशभूषण महाराज से क्षुल्लिका दीक्षा एवं सन 1956 में बीसवी सदी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांति सागर महाराज के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागर महाराज से आर्यिका दीक्षा धारण कर "ज्ञानमती " नाम प्राप्त किया.
उनके विश्वव्यापी कार्यकलापों, विशाल साहित्य सृजन, जनकल्याणक आदि के महान कार्यों का मुल्याकंन करते हुए जहाँ समाज एवं विभिन्न आचार्यों ने उन्हें गणिनीप्रमुख, चारित्रचंद्रिका, युग्प्रवार्तिका, वत्सल्यमूर्ति, वाग्देवी, राष्ट्रगौरव आदि उपाधियों से अलंकृत किया है, वहीँ डा. राममनोहर लोहिया, अवध विश्वविद्यालय - फैजाबाद ( उ.प्र.) ने सन 1995 में डी.लिट. की मानद उपाधि प्रदान कर अपने गौरव को बढाया है.
पूज्य माताजी के द्वारा दो हजार वर्ष प्राचीन षट्खन्डागम ग्रन्थ के सूत्रों की सोलहों पुस्तकों की सरल संस्कृत टिका का लेखन पूर्ण हो चूका है. पूज्य माताजी स्वयं कहा करती हैं की मैंने षट्खन्डागम की सोलहों पुस्तकों की संस्कृत टीका करके अपने आध्यात्मिक जीवन पर कलशारोहण किया है. साथ ही पूज्य माताजी के मन में उपेक्षित तीर्थंकर जन्मभुमियों के उद्धार एवं विकास का प्रमुख लक्ष्य भी सदैव बना रहता है. जैन धर्म की प्राचीनता, भगवान ऋषभदेव का विश्वस्तरीय प्रचार, स्कूली पाठ्य पुस्तकों में प्रकाशित जैन धर्म सम्बन्धी भ्रांतियों के संशोधन का प्रबल पुरुषार्थ आदि समसामयिक कार्य आपकी विशेष ज्ञा्नप्रतिभा के परिचायक हैं.
ऐसी प्राचीन आर्षमार्ग की संरक्षिका एवं बीसवी सदी के प्रथम दिगंबर जैनाचार्य चरित्रचक्रवर्ती श्री शान्तिसागर महाराज (दक्षिण) की निर्दोष परम्परा के जीवंतरूप दर्शाने वाली जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी पूज्य गणिनी प्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी चिरकाल तक भव्यों को अपनी छत्रछाया प्रदान करती रहें,यही मंगल भावना है.